जब मन पीड़ा से फटता हो
जब सिर्फ अँधेरा दिखता हो
जब दूर तुम्हारा साथी हो
जब आवाज ना उस तक जाती हो
जब पानी आँखों से बहता हो
जब वक्त ना तेरा कटता हो
तब ओढ़ के अपना दुख तुम
मेरे पास चले आना
कुछ और नहीं बस साथ अपने
तुम बांध व्यथा अपनी लाना
मैं राह नहीं दिखला पाऊ
मैं काम भले ना आ पाऊ
पर साथ तुम्हारे बैठूंगा
और दुख के कान मैं ऐठूंगा
और साथ मुझे तुम पाओगे
जब जब भी तुम घबराओगे
फ़िर जीवन जब आसान लगे
दिखने में नया आसमां लगे
जब सूरज फिर से उगने लगे
और स्याह रात ढलने लगे
तुम लौट जाना अपनी दुनिया में
मैं दूंगा पीछे से आवाज नहीं
पर फिर कभी अगर जरूरी हो
मैं बैठा मिलूंगा तुम्हें वही
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