मुफ़्फ़सिल हालात लिखते डरता हूँ
मैं अपने दिल की बात लिखते डरता हूँ
कोई समझ न जाए क्या बीत रही है
इसलिए ज़्यादा मुलाक़ात करते डरता हूँ
तेरे गीतों से सजते थे लब मेरे
अब वही गीत गुनगुनाने से डरता हूँ
तेरे साथ सुहानी थी हर शाम
अब उसी शाम के गहराने से डरता हूँ
पहले डरता न था किसी से मैं
अब तेरी याद तक से डरता हूँ
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